भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रभाव
के. एस. गुरूपंच
प्राचार्य, एम. जे. महाविद्यालय, भिलाई (छ.ग.)
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सारांश-
थ्क्प् से लाभों के बजाए हानियों के रुप तथा आकार अधिक विकराल हैं। ये हानियां उच्च वर्ग के बजाए हम आमजन को सर्वाधिक खतरा प्रकट करती हैं । अगर अर्थव्यवस्था में संकटों तथा महंगाई के प्रभाव की बात की जाए, तो सर्वाधिक असर आमजन पर पड़ता है, आम आदमी के लिए दाल रोटी जुटाना अत्यंत मुश्किल हो जाता है। थ्क्प् की हानियों का प्रत्यक्ष असर इसी भोली जनता पर पड़ता है। तो आईए जानते हैं थ्क्प् की हानियां-
बेरोजगारी - भारत में 90 प्रतिषत छोटे दुकानदार हैं, जो 7 प्रतिषत रोजगार देते हैं, संभवतः विदेशी कंपनिज के निजी लाभ की नितियों से ये बेरोजगार हो जाएंगे, सरकार ने इनके लिए कोई रोजगार की व्यवस्था नहीं की है। भारत में बेरोगारों की लाइन और लंबी हो जाएगी, राजनैतिक पार्टियां इनको लेकर अपनी-अपनी रोटियां सेंकनें का प्रयास करेंगी, भोली भुलक्कड़ जनता इन पार्टियों के कारनामें भुल जाएगी।
वित्तीय और शैक्षिक क्षेत्रों आदि में उपलब्ध सुविधाओं के संदर्भ में अनिवासी भारतीयों के समान सुविधाएं प्राप्त हैं। इन सुविधाओं में शामिल हैं:
ऽ भारत में कृषि / पौधरोपण संपत्तियों के अधिग्रहण के कुछ मामलों के अलावा अचल संपत्ति के अधिग्रहण, धारण, अंतरण और निपटान की सुविधा।
ऽ भारत में शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए अनिवासी भारतीयों के बच्चों हेतु उपलब्ध सुविधाएं, जिसमें सामान्य श्रेणियों में चिकित्सा महाविद्यालय, अभियांत्रिकी महाविद्यालय, आईआईटी, आईआईएम आदि।
ऽ एलआईसी, राज्य सरकार और अन्य सरकारी अभिकरणों की विभिन्न आवासीय योजनाएं।
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प्रस्तावना
1991 से पहले भारत सरकार ने विदेश व्यापार और विदेशी निवेशों पर प्रतिबंधों के माध्यम से वैश्विक प्रतियोगिता से अपने उद्योगों को संरक्षण देने की एक नीति अपनाई थी । उदारीकरण के प्रारंभ होने से भारत का बाहय क्षेत्र नाटकीय रूप से परिवर्तित हो गया । विदेश व्यापार उदार और टैरिफ एतर बनाया गया । विदेशी प्रत्यक्ष निवेश सहित विदेशी संस्थागत निवेश कई क्षेत्रों में हाथों - हाथ लिए जा रहे हैं । वित्तीय क्षेत्र जैसे बैंकिंग और बीमा का जोरदार उदय हो रहा है । रूपए मूल्य अन्य मुद्राओं के साथ-साथ जुड़कर बाजार की शक्तियों से बड़े रूप में जुड़ रहे हैं ।
आज भारत में 20 बिलियन अमरीकी डालर (2010 - 11) का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश हो रहा है । देश की विदेशी मुद्रा आरक्षित (फारेक्स) 28 अक्टूबर, 2011 को 320 बिलियन अरब डालर है ।(31.5.1991 के 1.2 बिलियन अरब डालर की तुलना में )। भारत माल के सर्वोच्च 20 निर्यातकों में से एक है और 2010 में सर्वोच्च 10 सेवा निर्यातकों में से एक है ।
भारतीय अर्थव्यवस्था:
भारत जीडीपी के संदर्भ में विश्व की नवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है । यह अपने भौगोलिक आकार के संदर्भ में विश्व में सातवां सबसे बड़ा देश है और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश है। हाल के वर्षों में भारत गरीबी और बेरोजगारी से संबंधित मुद्दों के बावजूद विश्व में सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में उभरा है। महत्वपूर्ण समावेशी विकास प्राप्त करने की दृष्टि से भारत सरकार द्वारा कई गरीबी उन्मूलन और रोजगार उत्पन्न करने वाले कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं ।
इतिहास:
ऐतिहासिक रूप से भारत एक बहुत विकसित आर्थिक व्यवस्था थी जिसके विश्व के अन्य भागों के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध थे । औपनिवेशिक युग ( 1773-1947 ) के दौरान ब्रिटिश भारत से सस्ती दरों पर कच्ची सामग्री खरीदा करते थे और तैयार माल भारतीय बाजारों में सामान्य मूल्य से कहीं अधिक उच्चतर कीमत पर बेचा जाता था, जिसके परिणामस्वरूप स्रोतों का द्विमार्गी ह्रास होता था । इस अवधि के दौरान विश्व की आय में भारत का हिस्सा 1700 ए डी के 22.3 प्रतिशत से गिरकर, 1952 में 3.8 प्रतिशत रह गया । 1947 में भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अर्थव्यवस्था की पुननिर्माण प्रक्रिया प्रारंभ हुई । इस उद्देश्य से विभिन्न नीतियाँ और योजना बनाई गयी और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कार्यान्वित की गयी ।1
1991 में भारत सरकार ने महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार प्रस्तुत किए, जो इस दृष्टि से वृहद प्रयास थे जिनमें विदेश व्यापार उदारीकरण, वित्तीय उदारीकरण, कर सुधार और विदेशी निवेश के प्रति आग्रह शामिल था । इन उपायों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने में मदद की तब से भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत आगे निकल आई है । सकल स्वदेशी उत्पाद की औसत वृद्धि दर (फैक्टर लागत पर) जो 1951 - 91 के दौरान 4.34 प्रतिशत थी, 1991-2011 के दौरान 6.24 प्रतिशत के रूप में बढ़ गयी ।
नीतियां, योजनाएं और प्रोत्साहन:
भारत सरकार द्वारा अपने विभिन्न कानूनों के समन्वय में विभिन्न योजनाओं, नीतियों और प्रोत्साहनों को घोषित किया गया है ताकि इनसे विदेशी भारतीयों को निवेश के ढेर सारे अवसर मिल सके। वे अनिवासी भारतीयों ध् भारतीय मूल के व्यक्तियों को विभिन्न सुविधाओं की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकें जैसे कि बैंक के खाते, निवेश के नियम और विनियमन आदि।
भारत में ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति’, है जो भारत में विदेशी निवेश के विभिन्न पक्षों का नियंत्रण करती है। इस नीति का लक्ष्य भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी अनुमत क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करना और साथ ही इसके विकास प्रभाव को विसारित करना है।2 लगभग सभी भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मुक्त रूप से अनुमत है। यह दो मार्गों से किया जा सकता है जो हैं स्वचालित मार्ग और सरकारी मार्ग। पहले मार्ग के तहत विदेशी निवेशकों को भारतीय रिजर्व बैंक या भारत सरकार से निवेश की अनुमति नहीं लेनी होती है। जबकि दूसरे मार्ग में विदेशी निवेश प्रवर्तन मंडल, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार का पूर्व अनुमोदन लेकर ही निवेश किया जा सकता है। ये शर्तें विदेशी भारतीयों पर भी लागू हुई है।3
एक महत्वपूर्ण योजना होने के नाते ‘पोर्टफोलियो निवेश योजना (पीआईएस), जिसके तहत अनिवासी भारतीयों/ भारतीय मूल के व्यक्तियों को मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध भारतीय कंपनियों के शेयरों में निवेश की अनुमति है अर्थात वे भारतीय कंपनियों द्वारा जारी किए गए शेयरों और परिवर्तन योग्य डिबेंचरों की ब्रिकी और खरीद कर सकते हैं। इसके लिए वे अधिकृत डीलर बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अधिकृत बैंक की नामनिर्दिष्ट शाखा से योजना के प्रशासन के लिए संपर्क कर सकते हैं और वे योजना के तहत निवेश करने के लिए एक अनिवासी भारतीय ध् भारतीय मूल के व्यक्ति को खाता खोलने के लिए अनुमति दिला सकते हैं।
करोड़ों दुकानदार होंगे बेरोजगार:
खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी निवेश को सुगम बनाने के लिए सरकार मन बना चुकी है। सरकार का यह आत्मघाती कदम छोटे-छोटे करोड़ों खुदरा व्यापारियों, लघु उत्पादकों और ग्राहकों के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा। अभी हाल ही में समाचार आया है कि सरकार के सचिवों की एक कमेटी ने कैबिनेट को सिफारिश की है कि मल्टी ब्रांड रिटेल अर्थात विविध ब्रांड के खुदरा व्यापार क्षेत्र में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी जानी चाहिए। यह मंजूरी मिल गई तो भारत में भी दैत्याकार विदेशी कंपनियां जैसे वालमार्ट, टेस्को, कारफूर आदि भी अपने स्टोर खोल सकेंगी। किसी अन्य कमेटी की तरह इस कमेटी ने भी अपनी सिफारिशों के पक्ष में ढेर सारे तर्क दिए हैं और यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश देश के लिए कितना लाभदायक है। कमेटी का कहना है कि आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े आधारभूत ढांचे में निवेश के चलते तैयार माल की बर्बादी कम होगी। इसका यह भी कहना है कि इससे रोजगार बढ़ेगा और किसानों को उनकी फसलों की बेहतर कीमत मिलेगी। कमेटी ने अपनी सिफारिशों के पक्ष में जो तर्क दिए हैं, वे बहुत ही कमजोर हैं। उनकी बड़ी आसानी से धज्जियां उड़ाई जा सकती हैं। मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति उचित है या अनुचित, यह इस बात से तय होगा कि क्या इससे उत्पादक (किसान या फैक्ट्री मालिक) के माल को आखिरी उपभोक्ता तक पहुंचाने की लागत यानि ‘वितरण लागत’ कम हो जाएगी। यहां वितरण लागत का तात्पर्य उस लागत से है जो किसी माल को उत्पादन की जगह से दूसरी जगह ले जाने, उसे स्टोर करने, उसके लिए वित्ताीय व्यवस्था करने तथा उसे अंततः उपभोक्ता को बेचने में उठानी पड़ती है। आर्थिक कार्यकुशलता को परखने का सबसे बढ़िया तरीका यह है कि हम सबसे पहले वितरण लागत की जांच करें।
भयावह बेरोजगारी को न्यौता:
मल्टी ब्रांड रिटेल के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने से एक ओर जहां उत्पादन क्षेत्र में लाखों लोगों का रोजगार खत्म हो जाएगा तो वहीं खुदरा व्यापार के क्षेत्र में करोड़ों लोगों के रोजगार पर आंच आएगी। बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार खत्म होने से देश में भयंकर स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, जिसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहेगा। मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मुद्दा बहुत गंभीर है। इससे पूरी अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगड़ जाएगा और देश में अराजकता फैल जाएगी। आपको यह सब बहुत नाटकीय लग रहा है? लेकिन दुर्भाग्य से यह बिल्कुल सच है।
अमेरिका से सीख लें:
लोग हमसे पूछ सकते हैं कि आखिर हम भारत में विशाल विदेशी खुदरा स्टोर्स के भविष्य के बारे में इतनी स्पष्टता के साथ कैसे भविष्यवाणी कर सकते हैं? इसका उत्तार बहुत साधारण है। हम हवा में भविष्यवाणी नहीं कर रहे। भारत में क्या होगा, यह जानने के लिए हमें केवल यह देखना होगा कि अन्य जगहों पर क्या हुआ था।
अमेरिका के विशाल खुदरा स्टोर्स के बारे में वहां के एक वरिष्ठ बुद्धिजीवी ने मुझे बताया, ‘‘बड़े खुदरा स्टोर्स को हमेशा एक चीज की तलाश रहती है और वह है सस्ते से सस्ते माल की आपूर्ति करने वाले, जो प्रायः समुद्र पार के दूसरे देशों में होते हैं। वालमार्ट, टारगेट और ऐसे ही दूसरे स्टोर्स में अन्य देशों का सस्ता सामान भरपूर मात्रा में मौजूद रहता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उत्पादित सामान वहां प्रायः न के बराबर होते हैं। हम अब ऐसी स्थिति में पहुंच रहे हैं जहां वालमार्ट को कम लागत वाले आपूर्तिकर्ता तो मिल रहे हैं, लेकिन उसके सामान को खरीदने के लिए यहां लोगों के पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं, क्योंकि स्थानीय स्तर पर उनके लिए कोई काम नहीं है। बड़े-बड़े रिटेल स्टोर्स तो विकसित हो गए लेकिन उत्पादन का हमारा आधार बर्बाद हो गया।’’ 1979 में अमेरिका में उत्पादन से जुड़ी नौकरियां अपने चरम उत्कर्ष पर थीं। उस समय यहां उत्पादन क्षेत्र में 1.95 करोड़ लोगों को नौकरी मिली थी। तब से नौकरियों का आंकड़ा लगातार घट रहा है। वर्ष 2000 में 1.73 करोड़, 2004 में 1.43 करोड़, 2009 में 1.27 करोड़ तथा 2011 में केवल 1.18 करोड़ नौकरियां रह गईं। इस प्रकार 32 वर्षों में 77 लाख नौकरियां खत्म हो गईं, जिसका तात्पर्य यह है कि अमेरिका में उत्पादन क्षेत्र में प्रतिवर्ष 2,40,000 या प्रति माह 20,000 नौकरियां खत्म होती गईं। नौकरियों में इस अप्रत्याशित गिरावट के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला तो यह कि समय के साथ उत्पादन से जुड़ी तकनीकें बेहतर होती गईं, जिसके चलते कम लोग ज्यादा उत्पादन करने में सक्षम हो गए। नौकरियों में गिरावट का दूसरा प्रमुख कारण बड़ी रिटेल कंपनियों का विकास है, जिन्होंने अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए विदेशों से सस्ता सामान मंगाना शुरू किया। इस कारण विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियां धीरे-धीरे घटती गईं। मई, 2011 में अमेरिका में बेरोजगारी 9.1 प्रतिशत के स्तर पर थी, जिसका तात्पर्य यह है कि वहां 1.39 करोड़ लोग बेरोजगार थे। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में फिर से जान फूंकने के लिए ओबामा प्रशासन 2009 से अब तक 1.6 ट्रिलियन डालर का निवेश कर चुका है। इसके बावजूद बेरोजगारी के आंकड़े कम होने का नाम नहीं ले रहे। आने वाले दिनों में ऐसा होने की कोई संभावना भी नहीं दिख रही, क्योंकि बड़ी रिटेल कंपनियों ने अमेरिका के रोजगार ढांचे को ही विकृत कर दिया है।
निजी विदेश निवेश का प्रवाह:
स्च्ळ नीतियों को अपनाने के बाद निजी विदेशी निवेश को बढ़ाने का अधिक अवसर मिला है। इससे भारतीय योजना-निर्माताओं तथा राजनीतिज्ञों को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि घरेलू अर्थव्यवस्था में पुनः निवेश के लिए बहुत अधिक अधिक्य प्रजनित नहीं हो पा रहा था और स्वदेशी तकनीक व प्रौद्योगिकी पुरानी होती जा रही थी। यहाँ ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि निजी विदेशी निवेश के फलस्वरूप देश में न केवल पूंजी प्रवाहित होती है बल्कि प्रद्योगिकी या टेक्नोलाॅजी भी प्रवाहित होती है।
’तालिका विदेशी निवेशकों द्वारा स्वीकृत और निवेशित राशि का राज्यवार ब्योरा (अगस्त 1991 से सितम्बर 1996 तक)
स.क्र. राज्य स्वीकृत राशि (करोड़ में)
1 दिल्ली 16.556
2 महाराष्ट्र 11.437
3 गुजरात 5.766
4 तमिलनाडू 5.007
5 पश्चिम बंगाल 4.897
6 कर्नाटक 4.721
7 उड़ीसा 2.721
8 आंध्र प्रदेश 2.406
9 उत्तर प्रदेश 2.208
10 मध्य प्रदेश 2.021
11 पंजाब 8.01
12 अन्य 27.761
’स्त्रोत -हिन्दुस्तान दैनिक, पटना, 10 सितम्बर, 1996
उपसंहार:
सभी चमकने वाली चीजें सोना नहीं होतीं। किसी भी कहानी का अंधेरा या ऋणात्मक पक्ष भी होता है। भारत की स्च्ळ नीतियों से संबंधित कुछ ऋणात्मक पक्ष भी हैं जैसे कृशि की अवहेलना की गई है। कृशि क्षेत्र का धीमा विकास और औद्योगिक विकास की क्रिया इसी की देन है।4 हानियों के साथ फायदे भी देखे जा सकते हैं जैसे स्च्ळ नीतियों को अपनाने के कारण ही भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों के स्तर में कुल मिलाकर वृध्दि हुई है। जिससे एक उभरती आर्थिक षक्ति के रूप में भारत की पहचान बनी है।5
संदर्भ:
4. Statistics for Economics, T.K. Jain,Publisher,VK PUBLICATIONS, ISBN 9380735537,pp 91
5. Vishav Vayapar Sangathan Tatha Bhartiya Arthvayavastha (in Hindi), Ram Naresh Pandey, Publisher-Atlantic Publishers and Dist, 2004, ISBN 8126903678, pp 121
Received on 07.12.2014 Modified on 16.12.2014
Accepted on 30.12.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 2(4): Oct. - Dec. 2014; Page 235-237